आजादी के 70 साल…बाकी हैं कई सवाल…!

सुदर्शन चक्रधर.
भारत के 70 वें स्वाधीनता दिवस की पूर्व संध्या पर पहली बार देश को संबोधित करते हुए भारत के नए राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने देशवासियों को बधाई देते हुए गरीबी, ईमानदारी और भ्रष्टाचार जैसे कई सवालों पर अपनी बात रखी और देशवासियों को शुभकामनाएं दीं. महामहिम के अनुसार न्यू इंडिया में गरीबी के लिए कोई जगह नहीं है. इसका मतलब यही है कि भारत अब गरीब देश नहीं रहेगा या नहीं कहलाएगा, किंतु सवाल तब खड़े होते हैं, जब उत्तरप्रदेश के गोरखपुर में गरीब और मासूम बच्चों को सांस लेने के लिए ऑक्सीजन का सिलेंडर नहीं मिलता और उन्हें असमय मौत के मुंह में समा जाना पड़ता है! 70 साल की आजादी में सवाल तब उठता है, जब नेताओं के चरित्र पर प्रश्नचिह्न लगता है. 70 साल की इस आजादी पर सभी वर्ग, धर्म और श्रेणी में स्वच्छता और भाईचारे का सवाल आज भी कायम है. सवाल देश की एकता और अखंडता अक्षुण्ण रखने का भी है. सवाल जागरूकता का है, संविधान का है, कानून के शासन की अनिवार्यता का है. सवाल धर्मनिरपेक्षता का है, सांप्रदायिकता का है. सवाल उन वोटों की राजनीति का भी है, जिसे हमारे राजनेताओं ने भारतवासियों को दिया है.
सवाल बहुतेरे हैं. इनमें देश की जनता के सामने नोटबंदी से लेकर विकास और फिर जीएसटी का सवाल भी खड़ा है. देश के सामने निर्भयाओं का भी सवाल है, जो बलात्कार की शिकार हो क्रूरता से मार डाली जाती हैं. सवाल राष्ट्र निर्माण का है, सवाल खुले में शौच से मुक्ति का है, सवाल विकास का है, शिक्षा का है, सूचना की पहुंच बढ़ाने का है, सवाल जिम्मेदारी का है. राष्ट्रपति के शब्दों में आज भी गरीबी हर जगह देखी जा सकती है लेकिन उन्हें विश्वास है कि न्यू इंडिया में गरीबी के लिए कोई गुंजाइश नहीं होगी. अर्थात वह मोदी सरकार की वाणी तो बोल रहे हैं, लेकिन उसपर अमलीकरण कब तक होता है? यह देखना जरूरी होगा. राष्ट्रपति महोदय के अनुसार स्वतंत्र भारत का सपना हमारे गांव-गरीब और देश के समग्र विकास का सपना है, लेकिन जन-जन का सवाल यहां यह है कि आजादी के 70 वर्षों बाद भी क्या हमें वास्तविक आजादी मिली? देश के 90 प्रतिशत किसान आज भी गुलामी के साये में जी रहे हैं. सरकार की नीतियों के खिलाफ आंदोलनरत हैं. कई स्थानों पर काली पट्टी बांधकर शासकीय स्वतंत्रता दिवस समारोह में उनका शामिल होना आखिर क्या दर्शाता है? क्या वाकई किसानों को आजादी मिली? क्या वाकई इस देश से गरीब आजाद हुआ? क्या कश्मीर सहित आतंकवाद की समस्या सुलझ गयी? क्या लड़कियां रात के समय आजाद घूम सकती हैं? क्या भ्रष्टाचार इस देश से नष्ट हो गया? क्या घोटाले करना राजनेताओं ने बंद कर दिए? आखिर हमारा देश, हमारा समाज कहां जा रहा है? इस पर विचार मंथन करने की जरूरत है. स्वतंत्रता सेनानियों को श्रद्धांजलि देकर उनकी कुर्बानियों को याद करने से महज काम नहीं चलने वाला! अब राष्ट्र के चरित्र निर्माण निर्माण की आवश्यकता पर भी महामहिम राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने बल दिया. अब यह देशवासियों को तय करना होगा कि 70 साल बाद हम अपने देश को आखिर किस ओर ले जाएंगे? क्योंकि यह अकेले केंद्र या राज्य सरकार की जिम्मेदारी नहीं है. इस देश को संभालना सवा सौ करोड़ भारतवासियों की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए. (आलेख वरिष्ठ पत्रकार सुदर्शन चक्रधर के फेसबुक टाइमलाइन से साभार)






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