आत्मचिन्तन के लिए विपक्ष का चित्त अब तक स्थिर नहीं

संजय जोशी

अभी हाल ही में पाँच राज्यों में विधानसभा चुनाव सम्पन्न हुए और उनमें से चार राज्यों में भाजपा अपनी सरकार बना चुकी है। उसमें भी देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में तो भाजपा ने सारे कीर्तिमान ही तोड़ दिये। वस्तुतः उत्तर प्रदेश में गत कुछ वर्षों से जातीय और अल्पसंख्यकों के तुष्टीकरण के आधार पर चुनाव लड़े जाते रहे। सन् 2002 से लेकर 2017 तक दलितों और मुसलमानों को वोट बैंक बनाकर सत्ता का खेल खेला जाता रहा। प्रदेश की स्थिति लगातार बद से बदतर होती गयी। दलितों और मुसलमानों के ये तथाकथित नेता भाजपा को प्रदेश की सत्ता में आने से रोकने के लिए प्रत्येक प्रकार के कुत्सित हथकण्डे अपनाते रहे और प्रदेश के राजस्व से अपनी थैलियाँ भरते रहे। जो धन प्रदेश के विकास पर व्यय होना चाहिए था वह धन इन दलों के मन्त्रियों और कार्यकर्ताओं की तिजोरियों में जमा होते रहे। सड़क, बिजली, पानी आदि की समुचित व्यवस्था करने के स्थान पर व्यक्तिपरक विज्ञापनों और समाज को तोड़ने के निहित स्वार्थ से प्रेरित स्मारकों पर अन्धाधुन्ध धन व्यय किया गया। और धन के इस अपवाह में इन राजनीतिक दलों के नेताओं ने अकूत सम्पत्तियाँ एकत्र कीं। इसके परिणामस्वरूप इनके कार्यकर्ता उच्छृंखल और उद्दण्ड होते गये और प्रदेश में अराजकता के घोर बादल घनीभूत हो गये। चारों ओर भ्रष्टाचार, रंगदारी, हत्याएँ, बलात्कार और अन्यान्य जितने भी अपराध सम्भव थे उन सबका साम्राज्य व्याप्त हो गया।
2014 के लोकसभा चुनाव में गुजरात की समृद्धि और प्रगति से आकर्षित होकर देश की जनता ने श्री नरेन्द्र मोदी की कार्यशैली और कुशल नेतृत्वक्षमता से प्रभावित होकर उन्हें देश का भावी प्रधानमन्त्री बनाने का मन बना लिया। परिणामतः भाजपा देश का सबसे बड़ा राजनैतिक दल बनकर उभरा और श्री नरेन्द्र मोदी के प्रतिनिधित्व में सरकार का गठन हुआ। ढाई वर्षों के अपने संक्षिप्त कार्यकाल में भाजपा सरकार ने जिस द्रुत गति से योजनाओं का निर्माण किया और उसे अमली जामा पहनाना प्रारम्भ किया, उसकी गहन छाप उत्तर प्रदेश के चुनावों में भी पड़ी। प्रदेश की त्रस्त जनता को इन जाति और वर्ग विशेष के नेताओं द्वारा की उपेक्षा उनके मर्म को आहत कर चुकी थी। प्रदेश का नेतृत्व प्रदेश का प्रतिनिधित्व न करके परिवार का प्रतिनिधि हो गया। सरकार एक निगम के रूप में परिवर्तित हो चुकी थी जिसके सदस्य एक ही परिवार के व्यक्ति थे। और निराश जनता ने अपना भारी रोष व्यक्त करते हुए पूरी तरह से बसपा और समाजवादी पार्टी के नेतृत्व को अस्वीकार कर दिया।
यद्यपि समाजवादी पार्टी को अपनी पराजय के कारण स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे थे और उन्होंने अपनी इस पराजय को येन-केन प्रकारेण स्वीकार करने में अधिक समय नहीं लिया, किन्तु बसपा सुप्रीमो अपने अहंकार के हनन और पराजय को स्वीकार नहीं कर पा रही हैं। उन्होंने आत्ममन्थन के बजाय निर्जीव मशीनों और चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न खड़े करने प्रारम्भ कर दिये। वे यह भूल गयीं कि उन्होंने दलितों के नाम पर सत्ता हासिल करने के पश्चात दलितों को जिस स्थिति में पहुँचाया उस विषम स्थिति में दलितों को कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने भी नहीं पहुँचाया था। आजादी के 69 वर्षों के पश्चात भी दलितों की स्थिति आज भी वैसी ही बनी हुई है। सशक्त दलित नेता के रूप में उभरी मायावती ने दलित उत्थान का लबादा ओढ़कर स्वयं तो अकूत सम्पत्ति की मालकिन बन बैठी और साथ ही उनके परिवारजन भी समृद्धि के सागर में तैरते रहे। किन्तु जो दलित अपने उत्थान की आशा संजोये बैठे रहे उन्हें केवल निराशा ही हाथ लगी। सत्ता की भूख में मायावती इतनी उत्तप्त हो गयीं कि उन्होंने बहुजन समाज पार्टी के सिद्धान्तों को किनारे लगा दिया और “तिलक, तराजू, तलवार” का धुर विरोध करते-करते और उन्हें अपशब्दों से सुशोभित करते-करते पुनः उन्हीं लोगों की शरण में आ गयीं। सामाजिक समरसता का उनका यह ढोंग दर्शनीय था किन्तु दलित जनता इस प्रपंच को ताड़ गयी। कमोबेश यही स्थिति उत्तर प्रदेश के मुसलमानों की भी थी। इन राजनीतिक दलों ने वोट के लिए इनका जितना शोषण किया और भाजपा के प्रति इनके मन में जितना विष घोला उसका परिणाम प्रदेश के मुसलमानों ने स्वयं भुगता। नेतृत्वहीनता की स्थिति से जूझती कांग्रेस जब साइकिल पर सवार हुई तो जनता की रही-सही उम्मीद भी धूसरित हो गयी। और परिणाम यह हुआ कि प्रदेश में भी भारतीय जनता पार्टी को प्रचण्ड बहुमत मिला। विकास की विजय हुई और जातिगत समीकरणों का खेल खेलने वाले दलों को करारी पराजय का सामना करना पड़ा।
मायावती जी अपने कार्यकर्ताओं के सम्मुख अपनी अक्षमताओं को स्वीकार करने में स्वयं को असहज अनुभव कर रही हैं। चूँकि चुनाव में बसपा की पराजय का ठीकरा फोड़ने के लिए उन्हें कोई सिर नहीं मिल रहा है तो हताशा में चुनाव आयोग और ईवीएम मशीनों को दोष दे रही हैं। उनकी इस अर्थहीन आलोचना में कांग्रेस, आप, तृणमूल कांग्रेस और कुछ अन्य राजनीतिक दल भी केवल इसलिए सम्मिलत हो रहे हैं क्योंकि उन्हें अपना भविष्य अन्धकारमय दिखाई दे रहा है। इन दलों के सदस्यों में इतना साहस भी नहीं है कि वे अपनी पराजय का श्रेय अपने दल के अध्यक्षों को दे सकें। किन्तु वास्तविकता यही है कि विपक्षी दल हताशा में इतने अवसादग्रस्त हो गये हैं कि उनके पास कोई उचित तर्क ही शेष नहीं है और वे कुतर्कों के सहारे अपनी धूमिल होती छवि को स्थिर रखने की चेष्टा कर रहे हैं। कागज के मतपत्रों से उन्हें षड्यन्त्र करने की सुविधा मिल जायेगी इसलिए सत्ता में आने के लिए वे इलेक्ट्रानिक मशीनों की दक्षता पर प्रश्न खड़े कर रहे हैं। उन्हें यह ज्ञात हो जाना चाहिए कि देश में अब भ्रष्टाचार और बेईमानी के लिए कोई स्थान शेष नहीं रहने वाला है। प्रत्येक क्षेत्र में पारदर्शिता के जितने उपाय किये जा सकते हैं उन्हें लागू किया जायेगा। हाँ अब इन कथित नेताओं को यदि अपना अस्तित्व बचाना है तो उन्हें अपने आचरण और व्यवहार में परिवर्तन लाना ही होगा। लूट-खसोट की प्रवृत्ति का त्याग करना होगा और वातानुकूलित कक्षों को छोड़कर जनता के बीच जाकर उनका धरातलीय अध्ययन करने में अपना पसीना बहाना होगा। यदि इतनी सामर्थ्य और त्याग का वे वरण कर सकें तो सम्भव है कि वे स्वयं का अस्तित्व बनाये रखने में समर्थ हो पायें अन्यथा उन्हें राजनीति का परित्याग करना ही होगा।