नागपुर में हर साल अपराध के दलदल में 100 से अधिक बच्चे

अभय यादव/नागपुर.
नागपुर. किसी भी राज्य, जिले में अपराधों की संख्या बढ़ने-घटने वाली खबरें आपने खूब पढ़ी और देखी होंगी। हम नागपुर के संदर्भ में ऐसी जानकारी देने जा रहे हैं, जिससे आपके भी होश उड़ जाएंगे। शायद ही आप इस पर आसानी से भरोसा कर पाएं। पर, यह सौ फीसदी सच है। तो सुनिए अपने नागपुर जिले में बाल अपराधियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। वह भी गंभीर अपराधों में। जिन बच्चों के हाथ में किताबें होनी चाहिए, जिन बच्चों का समय पार्कों में और स्कूलों में बीतना चाहिए, वह बच्चे अपराध की दुनिया में पैर जमाने की कोशिश कर रहे हैं। ये बातें कोरी नहीं हैं। आंकड़े इसकी गवाही दे रहे हैं। नागपुर में हर साल 100 से अधिक “बाल अपराधी’ सामने आ रहे हैं। हत्या से लेकर हत्या के प्रयास तक के मामले बाल अपराधियों पर दर्ज हो रहे हैं। ये तो दर्ज आंकड़े हैं। बहुत मामले ऐसे होते हैं, जिनमें रिपोर्ट नहीं हो पाती। ऐसे भी मामलों में बाल अपराधियों की संलिप्तता से इनकार नहीं किया जा सकता।
कुछ इस तरह के हैं अपराध
चोरी, झगड़ा, मारपीट, मद्यपान, यौन उत्पीड़न, हत्या, हत्या का प्रयास, धोखाधड़ी, दुष्कर्म, बेईमानी, जालसाजी, आवारागर्दी, तोड़-फोड़, छेड़खानी आदि।
कौन होता है बाल अपराधी
भारतीय कानून के अनुसार, सोलह वर्ष की आयु तक के बच्चे-किशोर अगर आपराधिक घटनाओं को अंजाम देते हैं तो उन्हें बाल अपराधी कहते हैं। जानकारों का मानना है कि अधिकांश बच्चे फिल्मों को देखकर आपराधिक गतिविधियों को अंजाम दे रहे हैं। फिल्म के किसी हीरो से खुद की तुलना करते हुए ऐसे दलदल में धंस जाते हैं, जहां से लौटना मुश्किल होता है। जब तक उनके समझ में आता है, तब तक उनकी गलतियां उन्हें अपराधी बना चुकी होती हैं।
बाल सुधारगृहों में हर साल 70 से अधिक बाल अपराधी
नागपुर के बाल सुधारगृहों में हर वर्ष 70 से अधिक बाल अपराधी आते हैं। पिछले वर्ष (2016) जरीपटका स्थित पाटणकर चौक में बाल सुधारगृह से 14 बाल आरोपी सुरक्षा दीवार फांदकर भाग निकले थे। वर्ष 2017 में इसी बाल सुधारगृह से 22 बाल आरोपियों ने वहां के चौकीदार को बंधक बनाया और इमारत की छत पर गए और पेड़ के सहारे नीचे उतरकर भाग निकले थे। नागपुर में बाल आरोपियों के ये वह आंकड़े हैं, जो पुलिस की रिकॉर्ड में हैं।
बाल अपराध रोकने परिवार की महत्वपूर्ण भूमिका
अपराध शाखा पुलिस विभाग, शहर नागपुर के डीसीपी संभाजी कदम का कहना है कि बाल आरोपियों’ में 14-16 वर्ष के किशोर ज्यादा होते हैं। इनमें अपराध को लेकर कोई भय नहीं होता है। इस उम्र के किशोर अपराध करने से नहीं हिचकते हैं। जाने-अनजाने एक को देखकर दूसरा बालक भी वैसा ही गलत आचरण करने लगता है। बच्चों को केवल खिलाने-पिलाने या शिक्षा दिलाने में ही अपना कर्तव्य पूरा न समझ कर उन्हें अच्छा संस्कार देना भी जरूरी है।
मानसिक विकृति है बाल अपराध
मनोचिकित्सक डॉ. अविनाश जोशी का कहना है कि चार फीसदी बच्चों में जन्म से ही एंटीसोशल पर्सनाल्टी डिसआर्डर होता है। ऐसे बच्चे बचपन से ही छोटी-छोटी चोरी करने और झूठ बोलने के आदी होते हैं। बच्चा होने के कारण परिजन उन्हें नादान समझते हैं। आगे चलकर यह बच्चे नशा करना, चोरी करना और अपराध करना सीख जाते हैं। इसके बाद वे अपने जैसे लोगों की तलाश कर उनकी गैंग तैयार कर या बड़े अपराधियों से जुड़कर अपराध करने लगते हैं। इन चार फीसदी बच्चों में कुछ बच्चे अपराधी प्रवृत्ति के नहीं होते, लेकिन वह लोगों का आदर नहीं करते हैं। with thanks from bhaskar.com






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