सिद्धी धमाल को संरक्षण की दरकार

देश में जन्म से लेकर मृत्यु तक हर मौके पर नृत्य की परंपरा है। हर नृत्य में भावनाओं की अभिव्यंजना होती है। अफ्रीका मूल के, पर गुजरात में आ बसे सिद्धियों का परंपरागत नृत्य हजरत बाबा गौर की इबादत में किया जाता है। शायद ही ऐसी कोई पुस्तक हो, जहां इन सिद्धियों का इतिहास मिलता हो। ऐसा विश्वास किया जाता है कि सिद्धियों का धमाल नृत्य करीब 700 साल पुराना है, जिसे गुजरात में बसे इसी सिद्धि समुदाय ने संरक्षित किया है। अपने देश में इस नृत्य के बारे में भले ही जानने वाले कम हैं, लेकिन इसकी प्रसिद्धि बहुत विस्तृत है।
—-
संजय स्वदेश
—-
गुजरात के लोकनृत्य गरबा और दांडिया को जितनी लोकप्रियता और सम्मान मिला है, उतना राज्य के सिद्धि आदिवासियों के नृत्य धमाल को नहीं मिला, जबकि यह नृत्य किसी भी मामले में गरबा और दांडिया से कम नहीं है। बहुत ही कम लोग यह जानते होंगे कि नृत्य के कलाकार अफ्रीकि मूल की जनजाति समुदाय के हैं। रूप-रंग और कद काठी भी अफ्रीकी जनजातियों की तरह ही है। पोशाक साधारण और परंपरागत होती है। घुटने तक के स्कर्ट और कमर तथा माथे पर मोर पंख लपेटे हुए, गले कौड़ियों की माला पहनते हैं। चेहरे पर सफेद, काला, हरा और लाल रंग की पट्टियां बनाते हैं। समुदाय के सदस्य कम पढ़े-लिखे हैं। कुछ ड्राइविंग करते हैं। नई पीढ़ी के बच्चे ऊंचे दर्जे की पढ़ाई कर रहे हैं। धमाल सिद्धियों की परंपरा में इस तरह से समाया है कि इसे अलग कर ही नहीं सकते हैं। फिलहाल सिद्धियों की ज्यादा संख्या गुजरात के तटीय क्षेत्रों में निवास करती है।
करीब 36 देशों में सिद्धी धमाल नृत्य की प्रस्तुति करने वाली एक टीम के प्रमुख कलाकार मुन्ना बादशाह की माने तो 16वीं शताब्दी के आस-पास सिद्धियों की एक टीम यहां अफ्रीका से आकर बसी। उनके पूर्वज ऐसा कहते थे कि अफ्रीका की एक टीम व्यापार या बेशकीमती पत्थरों की तलाश में गुजरात के रतनपूर आई और यहीं की होकर रह गई। देश भर के सिद्धि अगस्त माह में रतनपुर के हजरत बाबा गौर के दरगाह में इबादत के लिए करीब दस दिन के लिए इक्कठे होते हैं। उस समय यह जगह अफ्रीका के एक गांव की तरह लगता है। अपनी मूल भाषा भूल चुके सिद्धियों ने देश-दुनिया के विभिन्न कार्यक्रमों में भाग लेने के कारण हिंदी भाषा में बातचीत करना सीख लिया है। इनकी आबादी गुजरात के कच्छ,ताला गीर, जाजपीपला, अहमदाबाद, भारूच, रतनपुर, झगडिया और सूरत के अलावा कर्नाटक और अंदमान निकोबार द्वीप समूह तक फैली है। फिलहाल देश में सिद्धियों की कुल आबादी करीब 50 हजार के करीब है। सिद्धी नृत्य के दौरान एक कच्चा नारियल हवा में उछालते हैं और जब वह नीचे गिरता है तो उसे सिर पर रोकते हुए इसे फोड़ते हैं। इस करतबबाजी में कई बार अनहोनी भी हो जाती है। कई बार हवा में उछाली नारियल का नुकिला हिस्सा उसने सिर में लग जाता है और वे खून से लथपथ हो जाते हैं। ऐसी अनहोनी कभी-कभी ही होती है। पर उत्साह कम नहीं होता है। अपनी कई प्रस्तुतियों में सिद्धी नृत्य के दौरान अंगार पर भी चलते हैं। सिद्धी महिलाएं भी धमाल करती हैं, लेकिन वे कभी मंच प्रस्तुति नहीं देती हैं। कुछ दिन पहले नागपुर में भारत सरकार की ओर से आयोजित एक कार्यक्रम में सिद्धियों की एक टीम धमाल नृत्य की प्रस्तुति दे रही थी। बेहतरीन लोक नृत्य के बीच में एक स्टेप आधुनिक डांस का दिखा। कार्यक्रम समाप्ति के बाद इस संबंध में सिद्धियों की टीम ने पूछने पर बताया कि विशुद्ध लोक नृत्य को पूर्ण रस के साथ आनंद लेने वाले श्रोता रहे कहां, लिहाजा, नये जमाने ने नये श्रता विशुद्ध पारंपरिक लोक नृत्य में कही बारियत महसूस न करें, इसलिए एक दो स्टेप आधुनिक डांस का रखा गया है जिससे यह परंपरा जीवित रहे। यदि यह प्रवृत्ति कालांतर में भी चलती रही तो वह दिन दूर नहीं जब यह आदिवासियों की बेहतरीन लोकनृत्य विलुप्त हो जाएगी। लिहाजा, सिद्धियों के धमाल को मजबूती से संरक्षण की दरकार है।