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हाय रे हामिद अंसारी

संजय तिवारी, संपादक विस्फोट डॉट कॉम
हामिद अंसारी पैदा तो हुए कोलकाता में लेकिन वो पैतृक रूप से उत्तर प्रदेश के गाजीपुर से संबंध रखते हैं। उनके दादा मुख्तार अंसारी भारत की राजनीति में ख्यातनाम शख्सियत रहे है। मुख्तार अंसारी एक सर्जन थे और लंदन में रहते थे। भारत आये तो एक साथ कांग्रेस और मुस्लिम लीग ज्वाइन कर लिया। वो खिलाफत आंदोलन में भी सक्रिय रहे और डॉक्टरों की एक टीम लेकर तुर्की घायल मुजाहीदीनों की सेवा करने भी गये थे। लेकिन धीरे धीरे उनका मुस्लिम लीग से मोहभंग हो गया। जिन्ना के उभार और मुस्लिम लीग के अलग राष्ट्र की मांग का उन्होंने समर्थन नहीं किया और वो गांधी जी के करीब हो गये। कांग्रेस के महासचिव और अध्यक्ष भी रहे।
जिस साल मुख्तार अंसारी की मौत हुई उसके एक साल बाद उन्हीं के खानदान में १९३७ में मोहम्मद हामिद अंसारी का जन्म हुआ। हामिद अंसारी ने अत्याधुनिक ईसाई स्कूलों में पढ़ाई की और उच्चतर अध्ययन के लिए वो अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में दाखिल हो गये। पढ़ाई लिखाई पूरी करके वो भारतीय विदेश सेवा में शामिल हो गये और करीब तीन दशक तक वो विदेश सेवा में अपनी सेवाएं देते रहे। अपने विदेश सेवा के कैरियर में वो यूएई, अफगानिस्तान, ईरान और सऊदी अरब के राजदूत भी रहे।
१९९९ में सरकारी सेवा से रिटायर होने के बाद भी वो किसी न किसी रूप में सरकारी संस्थानों से जुड़े रहे। कभी किसी समिति में तो कभी किसी सरकारी विभाग के सलाहकार के रूप में। २००२ में वो अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटी के वाइस चांसलर बने और चार साल चांसलर भी रहे। इसके बाद अल्पसंख्यक आयोग में सलाहकर भी रहे और १० अगस्त २००७ को भारत के नौंवे उपराष्ट्रपति निर्वाचित हुए।
बतौर उपराष्ट्रपति उन्होंने दो कार्यकाल पूरा किया और एक बार विवाद में भी रहे जब उन्हें सोशल मीडिया पर इसलिए ट्रॉल किया गया कि उन्होंने गणतंत्र दिवस परेड में सलामी नहीं ली। लेकिन विदाई के वक्त जाते जाते उनके एक इंटरव्यू ये वो ज्यादा विवाद में आ गये कि भारत के मुसलमान भयग्रस्त हैं। अभी उनको रिटायर होने में पूरे चौबीस घण्टे बचे थे कि राज्यसभा टीवी पर उनके इस इंटरव्यू से एक बार फिर सोशल मीडिया पर उनकी आलोचना हुई। उनके इंटरव्यू का असर ये हुआ कि उनके विदाई सत्र में बोलने के लिए जब पीएम मोदी खड़े हुए तो उन्होंने भी उनके खानदान के ”खिलाफत” से रिश्ते को याद किया और ”मुस्लिम देशों” में किये गये उनके काम काज की याद दिलाई।
हामिद अंसारी न सिर्फ ऐसे खानदान से आते हैं जो महात्मा गांधी के प्रति पूरी तरह समर्पित है बल्कि वो खुद गांधी के आदर्शों में आस्था रखनेवाले व्यक्ति हैं। वो अहिंसा और भारत की विविधतापूर्ण संस्कृति को आदर्श माननेवाले लोगों में से हैं। लेकिन संभवत: करण थापर के सवाल ऐसे थे जिसने उन्हें उलझा दिया और उनके द्वारा कही गयी बात पर विवाद हो गया। हामिद अंसारी का यह कहना कि लोगों की नागरिक निष्ठा पर सवाल उठाया जा रहा है, आंशिक रूप से सच भी है। देश में मुसलमानों के साथ कुछ अप्रिय घटनाएं भी हुई हैं। लेकिन सिर्फ इतने से समूचे देश को दोषी तो करार नहीं दिया जा सकता? मीडिया में जिन मुद्दों को किसी खास मकसद के तहत प्रचारित कर दिया जाता है, सिर्फ उस प्रचार के प्रभाव में आकर हामिद अंसारी को इतनी बड़ी बात बोलने से बचना चाहिए था। क्योंकि वो एक ऐसे पद से रिटायर हो रहे हैं जो सवा सौ करोड़ भारतीयों का पद है, किसी हिन्दू या मुसलमान का नहीं।
तिस पर तीन तलाक के मुद्दे पर उन्होंने अदालती हस्तक्षेप को गैर जरूरी बताते हुए उन्होंने जो दलील दिया उससे उनका यह विदाई इंटरव्यू और संदेहास्पद बन गया। किसी संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति ही अगर संवैधानिक संस्थानों को किसी खास मजहब या वर्ग के लिए गैर जरूरी बतायेगा तो बताइये भला सवाल नहीं उठेंगे? हामिद अंसारी इससे बचते तो ज्यादा गरिमामय माहौल में विदा होते।






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